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पत्नी को पति का नाम लेने से क्यों रोका गया?

तीसरी आंख
/
January 10, 2025

हम देखते हैं कि आजकल नव दंपत्ति बेहिचक एक-दूसरे को उनके नाम से पुकारते हैं। न तो इसमें उन्हें तनिक शर्म महसूस होती है और न ही ऐसा करने में उनको कुछ आपत्तिजनक लगता है। यहां तक कि अब तो प्यार से रखे गए शार्ट नेम का भी उपयोग करने लगे हैं। इसे एक दूसरे के प्रति प्रेम का द्योतक माना जाने लगा है। इसके विपरीत परंपरा ये रही है कि पत्नी पति को न तो नाम से बुलाती है और न ही किसी के सामने पति का जिक्र उसका नाम ले कर करती है। पति ही नहीं, पति के बड़े भाई अर्थात जेठ का नाम लेने से भी परहेज करती हैं। आज भी ऐसी पीढ़ी मौजूद है, जिसमें इस परंपरा का निर्वाह किया जा रहा है। वैसे, कई ऐसे पुरुष भी हैं जो पत्नी को नाम से नहीं पुकारते। वे सुनती हो, ऐसा कह कर बुलाते हैं। इसी प्रकार पत्नी नाम से पुकारने की बजाय अजी सुनते हो, कह कर संबोधित करती हैं।
मैंने ऐसे अनेक प्रसंग देखे हैं, जिनमें किसी सरकारी काम के दौरान महिला से पति का नाम पूछा गया तो उसे नाम लेने में बहुत हिचक हुई और साथ में खड़े अन्य व्यक्ति से कहा कि आप मेरे पति का नाम बता दीजिए। अनपढ़ या कम पढ़ी लिखी महिला की छोडिय़े, पढ़ी लिखी महिलाएं भी कभी अपने पति का जिक्र करती हैं तो मेरे पति या उसके नाम का संबोधन करने से बचती हैं और हमारे ये या हमारे साहब कह कर इंगित करती हैं।
सवाल ये उठता है कि आखिर किस वजह से पत्नी को पति का नाम न लेने की सीख दी गई। इस बारे में बहुत खोज करने पर यह जानकारी हासिल हुई कि स्कंध पुराण में कहा गया है कि पति का नाम लेने से उनकी उम्र कम होने लगती है। ऐसा करने पर उम्र कम क्यों होती है, इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिली। भला नाम लेने या न लेने का उम्र से क्या ताल्लुक? ज्ञातव्य है कि शास्त्रज्ञों के अनुसार श्रीगणेश ने भगवान वेद व्यास के मुख निकली वाणी को स्कंध पुराण में लिखा है। उसी में पतिव्रता स्त्रियों की मर्यादाओं का भी उल्लेख है। इन मर्यादाओं में पति के सोने के बाद सोना, सुबह पति से पहले उठना, पति के भोजन करने के बाद भोजन करना शामिल है। यहां तक कि पति के परदेश जाने पर शृंगार न करने तक की हिदायत दी गई है। जिन भी ऋषि-मुनियों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया, उसके पीछे उनका क्या प्रयोजन था, ये तो पता नहीं, मगर ऐसा प्रतीत होता है कि यह सब पुरुष प्रधान समाज की देन है। उसी पुरुष प्रधान व्यवस्था ने पति को परमेश्वर की संज्ञा दी है। एक तरफ यह कह कर महिला को महत्ता दी गई कि यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, तत्र रंमते देवता, वहीं दूसरी ओर मर्यादा के नाम पर महिलाओं पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगाए गए। सर्वविदित है कि महिलाएं पति की उम्र लंबी होने की कामना के साथ करवा चौथ का व्रत रखती हैं। मैंने कई प्रगतिशील महिलाओं तक को करवा चौथ का व्रत करते देखा है। कैसी अजीब बात है कि पत्नी की उम्र बढ़ाने के उद्देश्य से पति के लिए किसी व्रत अथवा आयोजन का प्रावधान नहीं किया गया।
धरातल की सच्चाई है कि आज भी वह पीढ़ी मौजूद है, जो पतिव्रता स्त्रियों के लिए बनाई गई मर्यादाओं का पूरी श्रद्धा से पालन करती है। कई महिलाएं पति के भोजन करने के बाद उसकी जूठी थाली में ही भोजन करती हैं। आज भी कई ऐसे परिवार हैं, जिनमें पहले पुरुषों को भोजन करवाने की व्यवस्था है, महिलाएं बाद में भोजन करती हैं। नॉन वेज खाने वाले परिवारों में पुरुषों को अच्छी बोटियां परोसी जाती है और महिलाएं जो कुछ बच जाता है, उसी को खा कर संतुष्ट रहती हैं।
हालांकि समय के साथ मर्यादाएं क्षीण हो रही हैं। महिलाएं पुरुषों के बराबर में आ कर खड़ी होने लगी हैं। विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं ने पुरुषों से बेहतर परिणाम दिए हैं। महिलाओं के कामकाजी होने के कारण परिवारों में उनकी अहमियत बढ़ रही हैं। लेकिन साथ उसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे हैं। इस बारे में किसी लेखक ने कहा है कि दुनिया में भी भले ही लोकतंत्र की बड़ी महत्ता हो, मगर परिवार में राजशाही ही पनपती है। अगर घर की बहू को भी समान अधिकार दे दिए जाते हैं तो वह पति व ससुर की बराबरी करने लगेगी, नतीजतन टकराव होगा और सामान्य शिष्टाचार शिथिल हो जाएगा। उनकी बात में दम है। किसी भी इकाई, परिवार हो या दफ्तर, उसमें किसी एक का प्रधान होना जरूरी है, अन्यथा अराजकता फैल जाएगी।

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