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पेशाब या शौच के वक्त नए आइडिया क्यों आते हैं?

तीसरी आंख
/
January 16, 2026

ऐसी मान्यता है कि पेषाब करते वक्त या षौच के वक्त दिमाग में नए आइडिया आते हैं। या कोई गुत्थी सुलझने का रास्ता ख्याल में आता है। समझा जाता है कि पेशाब या शौच के वक्त नए आइडिया आने के पीछे कई शारीरिक, मानसिक और न्यूरोलॉजिकल वजहें होती हैं। वस्तुतः दिमाग “रिलैक्स मोड” में चला जाता है। दिमाग फोकस्ड सोच से निकल कर डिफ्यूज सोच में चला जाता है। और यही मोड रचनात्मकता का सबसे बड़ा स्रोत है। इसलिए अचानक समाधान व आइडिया टपक पड़ते हैं। वैज्ञानिक को किसी अविष्कार का ख्याल आ सकता है। कवि के मन में कविता की पंक्तियां उभर सकती हैं। ऐसा माना जाता है कि पेषाब या षौच के वक्त वेगस नर्व अपनी भूमिका अदा करती है। वह दिल की धड़कन धीमी करती है, शरीर को शांत करती है, दिमाग यकायक खुल जाता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि जब मूत्राशय या आंत भरी होती है तो दिमाग का एक हिस्सा असुविधा में लगा रहता है, जैसे ही दबाव हटता है, मानसिक ऊर्जा अचानक मुक्त हो जाती है। यही मुक्त ऊर्जा सोच में छलांग लगाती है। पेषाब या षौच के वक्त आदमी निपट अकेला होता है, एकांत में होता है और एकांत में ज्ञानेन्द्री सक्रिय हो जाती है। न्यूरो साइंस के अनुसार जब हम कुछ खास नहीं सोच रहे होते, तब दिमाग का “डिफॉल्ट मोड नेटवर्क” एक्टिव हो जाता है। यही नेटवर्क यादों को जोड़ता है, पुराने अनुभवों से नए अर्थ निकालता है, अचानक वाह वाला पल देता है। लोकबुद्धि में कहें तो जब देह खाली होती है, तब चेतना भरती है। इसलिए अगर कभी शौचालय में कोई जबरदस्त आइडिया आए, तो उसे हल्के में मत लीजिए। हो सकता है वही आपके अगले लेख, समाधान या दर्शन की शुरुआत हो।

 

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